अवधेश राय कुछ कह रही थी चांद मुझ से. कुछ नगमें सुनाओ यार के. कहां खोये हो नुर -ए- मौसम. तुम्हारी मंजील नहीं बिते दियार में. कुछ कह रहीथी चींद मुझसे. कयां बताऊं रात -ए- मुशाफिर. गुमनाम हुं, ना कोई कलमों का सागिर्द रात कि निखरती हुश्न में मैं कहां तुम कहां. कोई नहीं अब मंजील के दियार में. #अवध
फरमान है, या इज़हार है, कुछ तो है, सनम जहाँ इंकार है, ना समझ नुसरत मेरी बातों को लफ़्फ़ाज़ी। दिल तेरे इश्क़ का फनकार है. लूट लो हमें अपने हुश्न से. दिल अक्लियतें तेरी इज़हार है. मैं फनकार तेरी तृष्णागी का. दिल तेरे इश्क़ का फनकार है. आज आये है, तौफ़ीक़ हमारे सब्र पर. दिल तम्मना तेरा इज़हार है. साकी मेरी महफ़िल वही. दिल तेरे इश्क़ का फनकार है, अवधेश कुमार राय "अवध"
अंदाज उनकी कयामत रहा साकी, मेरे दिल की अवाज लियाक़त रही साकी. सांसों में कौंधती रही तेरी सबनमी एहसास . मैं और ये रात अंधेरे में ढुढंती तेरी आवाज, सनम मेरी दिलकश गुमनामी अंदाज, मेरे महबूब ये दिलकशी अंजाम, रुहो से हो गये जुदा , तेरी दिल और सबनमी अंदाज . जरा गौर कर दिल की बारगी पर. मेरे लफ़्ज तेरी आवाज, यनम मेरी दिलकश गुमनामी अंदाज. मेरे महबूब ये दिलकशी अंदाज, #अवध 🌠
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